मैं दिल्ली के एक छोटे से किराए के कमरे में रहता हूँ। बीते दो साल से मैं कॉपीराइटर बनना चाहता था, पर मेरे पास लैपटॉप नहीं था। मैं दिन में कपड़े की दुकान पर बिक्री करता, रात को दोस्त के फोन पर लेख लिखने की कोशिश करता। बहुत मुश्किल था। फिर मैंने एक पुराना सेकेंड हैंड लैपटॉप खरीदा। दस हजार का। उधार लेकर। ब्याज भी देना था। तीन महीने में चुकाना था।
लैपटॉप लेकर मैं खुश था, पर ऊपर से 10,000 का कर्ज़ था। जो मैं अभी चुका नहीं सकता था। दुकान पर मेरी तनख्वाह महीने की 8,000 रुपये थी। किराया 4,000, खाना 2,000, बचे 2,000। तीन महीने में 6,000 रुपये बच सकते थे। 10,000 के लिए कम से कम पाँच महीने लगते। पर लोन देने वाले ने तीन महीने की डेडलाइन दी थी। नहीं तो ब्याज दोगुना।
मैं घबरा गया था। रात को नींद नहीं आती थी। लैपटॉप सामने पड़ा था, प्यासा सा, खाली सा। मैंने सोचा, कुछ तो करूं। फिर एक दिन मुझे याद आया, मेरे दोस्त ने कुछ महीने पहले मुझे एक साइट के बारे में बताया था। उसने कहा था, "भाई, थोड़े पैसे लगा दे, मज़ा आएगा।" तब मैंने नज़रअंदाज किया था। उस रात मैंने सर्च किया। खुला Vavada sign in पेज।
मैंने अकाउंट बनाया। कोई ईमेल, कोई नंबर। बस। फिर क्या? मैंने पहले दिन कुछ नहीं डाला। बस घूमता रहा। समझ रहा था कि ये कैसे काम करता है। दूसरे दिन मैंने 500 रुपये डाले। ये मेरे एक दिन का खाने का बजट था। सोचा, अगर गए तो दो दिन कम खाऊंगा। पर मन में एक बात थी - कर्ज चुकाना है। जल्दी से।
मैंने सबसे आसान गेम चुना - स्लॉट। नाम था "स्टारबर्स्ट"। 10 रुपये के दांव। पहले पाँच मिनट में 40 रुपये जीते। फिर सब हार गए। फिर जीते। दो घंटे बाद मेरे अकाउंट में 800 रुपये थे। मैंने निकाल लिए। कुल 300 रुपये का फायदा।
तीन दिन बाद मैंने फिर से Vavada sign in किया। इस बार 1,000 रुपये डाले। मन में कह रहा था, “तेरे पास इतने पैसे कहाँ?” पर दिमाग कह रहा था, “जोखिम उठाना पड़ेगा।” मैंने रूलेट खेलना शुरू किया। लाल-काले पर दांव। पहले दो दांव हारा। 500 के 250, फिर 125। मैं घबरा गया। फिर सोचा, अब तो जाने ही दो। अगला दांव पूरे 500 का लाल पर। गेंद घूमी। लाल। वापस 1,000 रुपये मिले। अब नुकसान नहीं था। फिर मैंने फिर से 500 का दांव काले पर। काला। अब कुल 2,000 रुपये। मैंने तुरंत निकाल लिए। फायदा - 1,000 रुपये।
अब कुल बचत थी - 300 (पहली बार) + 1,000 (दूसरी) = 1,300 रुपये। अभी भी 8,700 कर्ज बाकी था। मैंने रफ्तार बढ़ाई। हर दो दिन में खेलता। कभी जीतता, कभी हारता। पर जीत का सिलसिला ज्यादा था। क्योंकि मैंने खुद पर एक सख्त नियम लगा लिया था - अगर एक दिन में 1,000 रुपये जीत गया, तो रुक जाना। और हारे तो 500 से ज्यादा नहीं हारूंगा।
एक महीना बीत गया। मैंने रखा हिसाब। कुल 5,200 रुपये जीत चुका था। अब कर्ज बचा था 4,800 रुपये। मेरा मन था कि बचा हुआ भी इसी से निपटा दूं। पर मैं समझ गया था कि जल्दबाजी खतरनाक होती है।
एक रात मैं Vavada sign in करके बैठा था। मैंने सोचा, आज कुछ अलग करता हूँ। लाइव डीलर के साथ ब्लैकजैक। मैंने छोटे दांव लगाए। 50-50 रुपये के। थोड़ा-थोड़ा जीतता रहा। फिर एक हाथ में मुझे 11 मिला। मैंने डबल डाउन किया। 200 रुपये। अगला कार्ड आया - 10। कुल 21। डीलर के पास 19 था। मैं जीत गया। 400 रुपये मिले। फिर अगले हाथ में मुझे ब्लैकजैक मिल गया। एक ही हाथ में इक्का और चित्र वाला कार्ड। डीलर के पास 18 था। मैंने 500 रुपये लगाए थे, वो 750 वापस मिले। उस रात एक घंटे में मेरे 1,800 रुपये जुड़ गए। अब कर्ज बचा था सिर्फ 3,000 रुपये।
अगले दिन मैंने दुकान पर अतिरिक्त शिफ्ट की। तीन दिन में 1,500 रुपये और कमा लिए। बाकी बचे 1,500 रुपये। उस हफ्ते मैंने खेलना कम कर दिया। कर्ज के पैसे अब हाथ में थे। मैं सीधा लोन देने वाले के पास गया। तीन महीने से पहले ही सारे पैसे चुका दिए। उसने पूछा, “इतनी जल्दी कहाँ से लाए?” मैंने कहा, “थोड़ा काम ज्यादा किया, थोड़ा खेल लिया।” वो हँसा। मुझे गर्व था। पर गर्व के साथ थोड़ा डर भी था। क्योंकि मुझे पता था कि अगर मैं उस रूलेट में हार जाता, तो कहानी कुछ और होती।
लेकिन मैंने हार के बारे में सोचना छोड़ दिया। क्योंकि मैंने जोखिम उठाया था, और वो जोखिम काम कर गया। आज मैं उसी लैपटॉप पर कॉपीराइटिंग सीख रहा हूँ। तीन छोटे-मोटे क्लाइंट मिल गए हैं। हर महीने 3-4 हजार अतिरिक्त कमा लेता हूँ। और Vavada sign in करता हूँ तो महीने में एक दो बार। मनोरंजन के लिए। उसी तरह जैसे कोई सिनेमा देखने जाता है।
वो सेकेंड हैंड लैपटॉप आज भी मेरे साथ है। उसकी बैटरी चालीस मिनट चलती है, स्क्रीन पर एक धब्बा है, स्पीकर फटे हुए हैं। पर उसी लैपटॉप ने मुझे कर्ज से निकाला। उसी पर मैंने खेलना सीखा। उसी पर मैंने लिखना सीखा। उसी पर मैंने जीतना सीखा।
कभी-कभी लगता है, काश मैंने उस रात Vavada sign in नहीं किया होता, तो शायद आज भी कर्ज के बोझ तले दबा होता। पर मैंने कर दिया। और वो क्लिक मेरी जिंदगी का टर्निंग पॉइंट बन गया। मैं ये नहीं कहता कि ऐसा सबके साथ होगा। लेकिन मैं ये कहता हूँ कि कभी-कभी हम जोखिम से इतना डरते हैं कि हम जीत के मौके ही खो देते हैं। मैंने उस रात डर को अलविदा कह दिया था। और वो डर वापस नहीं आया। आज मैं कर्ज मुक्त हूँ, लिखना सीख रहा हूँ, और जी रहा हूँ। उसी पुराने लैपटॉप पर। उसी छोटे से कमरे में। पर अब उस कमरे में एक नई सी रोशनी है। और वो रोशनी मैंने खुद जीती है।